माँ भगवती धाम
यत्रास्ति भोगो नहि तत्र मोक्षो यत्रास्ति मोक्षो नहि तत्र भोगः।
श्री सुन्दरीसाधनतत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव ।।
जहाँ भोग है, वहाँ मोक्ष नहीं और जहाँ मोक्ष है वहाँ भोग नहीं, किंतु माँ भगवती की उपासना करने वालों के लिए भोग और मोक्ष दोनों ही सहज है।
कुण्डलिनी जागरण
आदौ पूरकयोगेनाप्याधारे योजयेन्मनः। गुदमेड्रान्तरे शक्तिस्तामाकुञ्च्य प्रबोधयेत्।।
लिङ्गभेदक्रमेणैव बिन्दुचक्रं च प्रापयेत्। शम्भुना तां परां शक्तिमेकीभूतां विचिन्तयेत्।।
सर्वप्रथम पूरक प्राणायाम के द्वारा मूलाधार में मन लगाना चाहिये। तत्पश्चात् गुदा और मेढ्र के बीच में वायु के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को समेटकर उसे जाग्रत् करना चाहिये। पुनः लिंग-भेदन के क्रम से स्वयम्भूलिंग से आरम्भ करके उस कुण्डलिनी शक्ति को सहस्रार तक ले जाना चाहिये। इसके बाद उस परा शक्ति का सहस्त्रार में स्थित परमेश्वर शम्भुके साथ ऐक्यभाव से ध्यान करना चाहिये।
तत्रोत्थितामृतं यत्तु द्रुतलाक्षारसोपमम्। पाययित्वा तु तां शक्तिं मायाख्यां योगसिद्धिदाम्।।
षट्चक्रदेवतास्तत्र सन्तर्व्यामृतधारया। आनयेत्तेन मार्गेण मूलाधारं ततः सुधीः।।
एवमभ्यस्यमानस्याप्यहन्यहनि निश्चितम्।
पूर्वोक्तदूषिता मन्त्राः सर्वे सिद्धयन्ति नान्यथा।।
जरामरणदुःखाद्यैर्मुच्यते भवबन्धनात्।
ये गुणाः सन्ति देव्या मे जगन्मातुर्यथा तथा।।
ते गुणाः साधकवरे भवन्त्येव न चान्यथा।
वहाँ द्रवीभूत लाक्षा रस के समान उत्पन्न अमृत का योगसिद्धि प्रदान करने वाली माया नामक उस शक्ति को पान कराकर षट्चक्र में स्थित देवताओं को उस अमृतधारा से सन्तृप्त करे। इसके बाद बुद्धिमान् साधक उसी मार्ग से कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार तक वापस लौटा लाये।
इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यास करने पर साधक के पूर्वोक्त सभी दूषित मन्त्र भी निश्चितरूप से सिद्ध हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। इसके द्वारा साधक जरा-मरण आदि दुःखों तथा भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। जो गुण मुझ जगज्जननी भगवती में जिस प्रकार विद्यमान हैं, वे सभी गुण उसी प्रकार उस श्रेष्ठ साधक में उत्पन्न हो जाते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है।